यीशु मसीह का कुंवारी से जन्म का महत्व | Yeshu Masih ka Kunwari se Janm ka Mahtav

Bro. Deva

यह वेबसाइट आत्मिक जीवन एवं परमेश्वर के सामर्थ में बढ़ने, आलौकिक एवं जयवन्त मसीह जीवन जीने, परमेश्वर के वचन को सरलता एवं गहराई से समझने में मदद करेगी। यदि आप परमेश्वर, प्रभु यीशु मसीह के वचन को समझने के लिये भूखे और प्यासे हैं तो मेरा विश्वास है कि यह वेबसाईट आपके लिये सहायक सिद्ध होगी।

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मेरे प्रियों यीशु  मसीह का कुंवारी से जन्म का एक विशेष महत्व है। यदि यीशु मसीह उद्धारकर्ता है तो यीशु को निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष रहना जरूरी है, अर्थात यीशु को बिना पाप वाला स्वभाव लेकर जन्म लेना होगा तब वह मनुष्यों के पाप क्षमा करने का अधिकार रख सकता है। चूंकि हमारा विश्वास है कि आदम ने पाप किया, इसलिये उसके पश्चात जितने भी मनुष्य जन्मे है उन सभी को अपने पिता से पापी स्वभाव पैतृक उत्तराधिकार में प्राप्त होता है। भजन संहिता 51ः5

 “देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा॥”

इस वचन से भी स्पष्ट होता है कि मनुष्य को पापी स्वभाव जन्म से ही पैतृक उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त है। ऐसी परिस्थितियों में यीशु मसीह कैसे पापी स्वभाव के बिना उत्पन्न हुआ होगा ? यदि यीशु मसीह को पापी स्वभाव पैतृक उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ तो फिर वह पापी था और अपने ही पापों के लिये मरा। आईये हम यीशु कैसे बिना पाप वाले स्वभाव में उत्पन्न हुआ और हमें एक उद्धारकर्ता के रूप में दिया गया इस विषय पर बिन्दुवार जानते हैं:-

01. यीशु मसीह का कुंवारी से जन्म लेने की भविष्यद्वाणी।

02. कुंवारी से जन्म लेने की भविष्यद्वाणी का पूरा होना ।

03. कुंवारी से जन्म का महत्व।

04. कुंवारी से जन्म लेने का अभिप्राय या उद्देश्य।

05. कुंवारी से जन्म लेने के सिद्धांत पर आपत्तियां।

 

01.  यीशु मसीह का कुंवारी से जन्म लेने की भविष्यद्वाणी।

उद्धारकर्ता को कुंवारी से जन्म लेने के विषय में पुराने नियम में पहले ही यषायाह भविष्यद्वक्ता द्वारा यीशु के जन्म कें 740 वर्ष पूर्व भविष्यद्वाणी कर दिया गया था।
यशायाह 07ः14 ‘‘सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानूएल रखेगी’’

02. कुंवारी से जन्म लेने की भविष्यद्वाणी का पूरा होना ।

यीशु मसीह का कुंवारी से जन्म लेने का विवरण हम मत्ती 01ः18-25 एवं लूका 1ः26-38 को जब ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं तब भविष्यद्वाणी पूरी होने के साथ-साथ बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें भी सामने आती है। जो इस प्रकार है:-
                        मरियम की मंगनी दाऊद के घराने के एक पुरूष यूसुफ के साथ हो चुकी थी। मरियम और यूसुफ के इकट्ठा होने से पहले ही मरियम पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती हो गई। इस बात का समाचार जब यूसुफ को मिला होगा तब यूसुफ का मन तो टूट गया होगा क्योंकि अभी वे लोग इकट्ठे नहीं हुये थे उनका यौन संबंध नहीं बना था। यूसुफ के मन में विचार आया कि मरियम को क्यों न चुपके से त्याग दिया जाए। बाईबल बताती है यूसुफ धर्मी था और वह मरियम को बदनाम नहीं करना चाहता था अर्थात यदि इस बात का पता लोगों को और न्यायियों को लगता तो व्यवस्था के अनुसार पथराव करके मरियम को मार डाला जाता क्योंकि मरियम का गर्भधारण यूसुफ से नहीं था। यूसुफ एक-दो दिन या इससे अधिक सोचने में बिताया होगा क्योंकि जब वह सोया तब स्वप्न में स्वर्गदूत ने उसे बताया कि मरियम का गर्भधारण पवित्र आत्मा की ओर से है और वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा। तब यूसुफ नींद से जागकर प्रभु के दूत की आज्ञा के अनुसार अपनी पत्नी को अपने यहां ले आया। जैसे यूसुफ ने विश्वास किया हमें भी निश्चित तौर पर विश्वास करना चाहिये कि मरियम का गर्भ धारण पवित्र आत्मा की ओर से था क्योंकि परमेश्वर हमें एक सिद्ध उद्धारकर्ता देने की गारन्टी देता है। यह बात भी मत्ती के द्वारा परमेश्वर ने सावधानी पूर्वक लिखवाया है कि विवाह के पष्चात भी जब तक मरियम पुत्र को जन्म नहीं दिया तब तक यूसुफ मरियम के पास नहीं गया अर्थात यौन संबंध नहीं बनाया। अर्थात अजन्मा बालक जो अभी जन्म नहीं लिया है मानवीय पिता द्वारा दूषित नहीं किया जा सकता था।
                              लूका भी जो मेडिकल डॉक्टर था, और वह भी जानता था कि प्रत्येक बालक का एक पिता होना ही चाहिये, किन्तु लूका भी सावधानी पूर्वक पवित्र आत्मा की ओर से असाधारण एवं चमत्कारी गर्भधारण के विषय में स्पष्ट करता है। (  लूका 1ः26-38  )

03. कुंवारी से जन्म का महत्व।

मेरे प्रियों, मनुष्य पूर्णतः पापमय स्वभाव के साथ उत्पन्न होता है। पापी स्वभाव उसे पैतृक उत्तराधिकार में प्राप्त होता है। आप इस बात पर विचार कर सकते हैं कि दूध पीते बच्चें को भी कोई जलन करना नहीं सीखाता, फिर भी कोई दूसरा बच्चा उसकी मां के गोद में जाने पर वह बच्चा रोने लगता है। झूठ बोलना कोई नहीं सीखाता, क्रोध करना कोई नहीं सीखाता पर हम देखते हैं कि ये स्वभाव हमें जन्म से ही प्राप्त होते हैं। अर्थात मनुष्य पूर्णतः पतीत है, तो उसे एक उद्धारकर्ता की आवष्यकता है जो उसका उद्धार कर सके, पापों की क्षमा कर सके।
                  यदि हम पुराने नियम में परमेश्वर की व्यवस्था (लैव्यव्यवस्था 04, 16 अध्याय) का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि यदि याजक परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करके पाप कर लेते थे तो पाप क्षमा के लिये एक निर्दोष बछड़े को पापबलि करके और इस्त्राईली लोग पाप कर लेते थे तो एक निर्दोष बकरे को पापबलि करके चढ़ाया जाता था। अर्थात परमेश्वर के नियम के अनुसार पाप क्षमा के लिये निर्दोष लहू का होना अनिवार्य है।
अब उद्धारकर्ता का शुद्ध और सक्षम होना नितान्त आवष्यक है। यीशु मसीह ही इस संसार का एकमात्र उद्धारकर्ता होना सम्भव है, क्योंकि एक ही उपाय था जिसके द्वारा यीशु पाप रहित स्वभाव में मनुष्य बन सकता था और वह था कुंवारी से जन्म लेने के द्वारा। कुंवारी से जन्म के रहस्य पर हमें विश्वास करना है, उसको स्वीकार करके उसकी स्तुति करनी है।
यद्यपि आपके मन में यह विचार चल रहा होगा कि क्या पापी स्वभाव माता से नहीं गया होगा तो इस उलझन का एक मात्र तर्कसंगत उत्तर यही है कि पापी स्वभाव पिता से बालक तक पहुंचता है, माता से नहीं। यीशु का कोई मानवीय पिता नहीं था क्योंकि वह पवित्रआत्मा के द्वारा गर्भ में आया था। मरियम उसकी माता थी परन्तु उसके द्वारा पापी स्वभाव बालक यीशु तक नहीं पहुंचा था। यीशु मसीह परमेश्वर भी था और पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में पड़ने के कारण परमेश्वर बना रहा। वह निष्पाप था, क्योंकि उसका जन्म कुंवारी से हुआ था, उसे पतीत और पापी स्वभाव उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं हुआ था, वह मूल-पाप से रहित था। परमेश्वर ने हमें आष्चर्यजनक रीति से एक उद्धारकर्ता दिया जो वास्तविक रूप से क्रूस पर लहू बहाकर हमें पापों से मुक्त कर सके।
यीशु का कुंवारी से जन्म लेने के सिद्धांत का उद्धार से घनिष्ठता के साथ संबंध है। यदि यीशु का जन्म कुंवारी से नहीं हुआ तो, हम सब जो यीशु पर विश्वास करते हैं एक भटके हुये पापी है और हमारा उद्धार नहीं हुआ। परंतु यह एक अखण्डनीय सत्य है। इस सिद्धांत की शिक्षा बाईबल में दी गई है और इस शिक्षा पर विश्वास करते हैं कि यह पूर्णतः सत्य है।

04. कुंवारी से जन्म लेने का उद्देश्य।

  •  मनुष्यों के उद्धार के लिय :–  यीशु मसीह का कुंवारी से जन्म लेने का उद्देश्य मनुष्य जाति का उद्धार करना है और यह मूल उद्देश्य है जो यीशु को इस संसार में लाया। इब्रानियों 02ः14-15

    “इसलिये जब कि लड़के मांस और लोहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे। और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले।”

    उक्त वचन के अनुसार हम जो संतान है मांस और लहू के भागी है अर्थात मनुष्य हैं। इसलिये प्रभु यीशु को मनुष्य बनकर इस संसार में आना पड़ा ताकि मांस और लहूं में अर्थात शरीर में दुःख उठाकर पूरा न्याय चुकाया जाए और शैतान की सामर्थ्य को उन पर से जो प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं विलोपित कर दे, हटा दे। अब शैतान उद्धार के विरोध में क्लेम नहीं कर सकता है क्योंकि यीशु ने पापों की क्षमा के लिये पूरा किमत चुका दिया है। पहले हम मृत्यु के भय में जीवन बिताते थे और शैतान मृत्यु का भय दिखाकर हमें अपना गुलाम बनाकर रखा था, किन्तु अब हम मृत्यु के भय से आजाद हैं।

  • परमेश्वर को प्रगट करने के लिये :यूहन्ना 01ः18

    “परमेश्‍वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया।”

    यीशु इस संसार में परमेश्वर के गुणों को प्रगट करने आया था। आप जितना ज्यादा प्रभु यीशु को जानेंगे उतना ज्यादा परमेश्वर को जानेंगे। यीशु ही परमेश्वर के वास्तविक स्वभाव या स्वरूप को इस संसार में प्रगट किया है।

  •  मनुष्य का संबंध परमेश्वर से जोड़ने के लिये : – 01 तीमुथियुस 02ः05

    “क्योंकि परमेश्‍वर एक ही है, और परमेश्‍वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।”

    परमेश्वर, शरीर में यीशु  के रूप था। यीशु ने पाप की पूरी कीमत चुकाकर मनुष्य को छुटकारा दिया ताकि मनुष्य की पहुंच परमेश्वर तक हो।

  • समस्त सृष्टि के बचाव के लिये : – रोमियों 08ः19-22 –  “क्योंकि सृष्टि बड़ी आशाभरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोह रही है। क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करने वाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई। कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी। क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। ”                              आदम ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन के कारण भूमि भी शापित हो गई और सड़ाहट में चली गई तब से उक्त वचन के अनुसार सृष्टि भी बड़ी आशाभरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जो रही है ताकि सड़ाहट से बाहर निकले और नई सृष्टि बने।

05. कुंवारी से जन्म लेने के सिद्धांत पर आपत्तियां।

  • वैज्ञानिक इसको स्वीकार नहीं करते क्योंकि जीव-विज्ञान की दृष्टि से यह सही नहीं है। यीशु स्वाभाविक गर्भधारण द्वारा इस संसार में नहीं आया, परन्तु एक आश्चर्यकर्म के गर्भधारण द्वारा आया है।
  • आधुनिक धर्म-विज्ञानी इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते। किन्तु यह अटल सत्य है, क्योंकि इसकी शिक्षा बाईबल की भविष्यद्वाणी और इतिहास द्वारा दी गई है।
परमेश्वर आपको आशीष दे।
आमीन।

 

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