परमेश्वर के भय का क्या अर्थ है? | Parmeshwar Ke Bhay Ka Kya Arth hai

Bro. Deva

यह वेबसाइट आत्मिक जीवन एवं परमेश्वर के सामर्थ में बढ़ने, आलौकिक एवं जयवन्त मसीह जीवन जीने, परमेश्वर के वचन को सरलता एवं गहराई से समझने में मदद करेगी। यदि आप परमेश्वर, प्रभु यीशु मसीह के वचन को समझने के लिये भूखे और प्यासे हैं तो मेरा विश्वास है कि यह वेबसाईट आपके लिये सहायक सिद्ध होगी।

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आज हम अति महत्वपूर्ण विषय पर अध्ययन करेंगे जो परमेश्वर के भय के विषय में है। मेरे प्रियों प्रत्येक मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना आवश्यक है चाहे बच्चे हो, जवान हो या बूढ़े हों। हर किसी को परमेश्वर से भय मानने के विषय में सीखना अति आवश्यक है। इसलिये आज हम परमेश्वर के भय का क्या अर्थ है ? परमेश्वर से भय मानने की आज्ञा, परमेश्वर का भय कैसा है, कौन सी बातें हमें परमेश्वर से डरने लिये प्रेरित करती है, परमेश्वर का भय क्यों आवश्यक है, भय मानने के क्या परिणाम है, इन विषयों पर अध्ययन करेंगे।
  1. परमेश्वर के भय का क्या अर्थ है ?
  2. क्या बाईबल हमें परमेश्वर से भय मानने की आज्ञा देती है ?
  3. सात बातें कि परमेश्वर का भय कैसा है ?
  4. पांच बातें जो हमें परमेश्वर से डरने के लिये प्रेरित करती हैं ।
  5. चार बातें जिनसे हमें नहीं डरना चाहिये। 
  6. परमेश्वर का भय क्यों आवश्यक है ?
  7. परमेश्वर के भय के दस फल । 
भय के विषय में जब हम विचार करते हैं तो दो प्रकार के भय समझ आते हैं । पहला गलत प्रकार का भय और दूसरा सही प्रकार का भय। गलत प्रकार के भय से जीवन में दुःख और कष्ट आता है। उदाहरण के लिये दासों का भय, एक ऐसा भय है जो एक बन्दी को यातना कक्ष में अपने सताने वाले जेल के अधिकारी या जल्लाद के प्रति होता है। यह उस प्रकार की भयानक चिन्ता है जिसमें व्यक्ति भयभीत हो जाता है और शरीर में कांपने लगता है। अथवा यह उस प्रकार का भय है जिसे एक दास अपने दुर्भावनापूर्ण स्वामी के प्रति रखता है जो कोड़ा लेकर आता है और दास को सताता है। दासों का भय एक दुष्ट स्वामी के प्रति दासता या गुलाम की स्थिति को संदर्भित करता है।
   सही प्रकार का भय वह है जो हमारे जीवन में आशीष और धन्यता को लेकर आता है। जैसे परमेश्वर का भय। मेरे प्रियों आईये सबसे पहले हम परमेश्वर के वचन से भय के विषय में पढ़ते हैं।
01. प्रभु के दास मूसा के अनुसार – इस्त्राएलियों को अपने अंतिम उपदेशों में बार-बार परमेश्वर के भय को उसकी सेवा करने और आज्ञा पालन से जोड़ा है। ( व्यवस्था विवरण – 5ः29, 6ः2,24, 8ः6, 10ः12, 13ः14, 17ः19, 31ः12)
उदाहरण के लिये व्यवस्थाविवरण 10ः12“अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्‍वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्‍वर यहोवा का भय माने, और उसके सारे मार्गों पर चले, उससे प्रेम रखे, और अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से उसकी सेवा करे”
02. भजनकार दाउद के अनुसार – परमेश्वर का भय मानना उसकी आज्ञाओं में आनन्दित रहने के समान है (भजन संहिता 12ः1 – क्या ही धन्य है वह पुरूष जो यहोवा का भय मानता है, और उसकी आज्ञाओं से अति प्रसन्न रहता है!) और परमेश्वर का अनुसरण करना है (भजन संहिता 119ः63जितने तेरा भय मानते और तेरे उपदेशों पर चलते हैं, उनका मैं संगी हूं।)।

01. परमेश्वर के भय का अर्थ

परमेश्वर के भय का अर्थ है धार्मिक निष्ठा अर्थात पूरी वफादारी और ईमानदारी के साथ हम अपने धार्मिक कर्त्तव्यों को जीवन भर करते रहें- बुराई और पाप से घृणा करें। उसकी आज्ञा का पालन करें। पूरे मन और प्राण से उसकी सेवा करें। उसका अनुसरण करें। उससे प्रेम करें। अपने आप को पवित्र करते जाएं। परमेश्वर को जानने और समझने में और परिश्रम करें। उस पर श्रृद्धायुक्त भरोसा और विश्वास रखें। उसका जीवन भर आदर करते जाएं।
उक्त अर्थ से हम समझते हैं कि परमेश्वर के भय को सभी को सीखना है। पति-पत्नी को, माता-पिता को और बच्चों को भी। परमेश्वर का भय पैतृक उत्तराधिकार से प्राप्त नहीं होता। परमेश्वर का भय सीखने की आवश्यकता होती है।

02. क्या बाईबिल हमें परमेश्वर से भय मानने की आज्ञा देती है?

हां परमेश्वर का वचन हमें परमेश्वर से भय मानने के लिये आज्ञा देता है। आईये हम परमेश्वर के वचन से देखते हैं:-
व्यवस्थाविवरण 13ः04“तुम अपने परमेश्वर यहोवा के पीछे चलना, और उसका भय मानना, और उसकी आज्ञाओं पर चलना, और उसका वचन मानना, और उसकी सेवा करना, और उसी से लिपटे रहना।”
01 पतरस 02ः17“सब का आदर करो, भाइयों से प्रेम रखो, परमेश्वर से डरो, राजा का सम्मान करो॥”
भजन संहिता 22ः23“हे यहोवा के डरवैयों उसकी स्तुति करो! हे याकूब के वंश, तुम सब उसकी महिमा करो! हे इस्त्राएल के वंश, तुम उसका भय मानो!”
इन वचनों के साथ-साथ मैं आपको बताना चाहता कि पहली शताब्दी के कलिसिया परमेश्वर के भय में चलती और बढ़ती जाती थी(प्रेरितों के काम 09ः31) और उसी समय कुरनेलियुस नाम का एक मनुष्य था जो परमेश्वर से अपने सारे घराने समेत डरता था (प्रेरितों के काम 10ः02) और परमेश्वर ने कुरनेलियुस और उसके घराने के लिये, उद्धार के लिये सुसमाचार का रास्ता खोला। परमेश्वर का भय मानना आशीष है।

03. सात बातें कि परमेश्वर का भय कैसा है?

01. यह बुराई से घृणा करना है।

नीति वचन – 08ः13 –  ‘‘यहोवा का भय मानना बुराई से बैर रखना है।”

02. यह बुद्धि है।

भजन संहिता 111ः10 – “बुद्धि का मूल यहोवा का भय है; जितने उसकी आज्ञाओं को मानते हैं, उनकी बुद्धि अच्छी होती है। उसकी स्तुति सदा बनी रहेगी॥”

03. यह जीवन का सोता है।

नीति वचन 14ः27 – “यहोवा का भय मानना, जीवन का सोता है, और उसके द्वारा लोग मृत्यु के फन्दों से बच जाते हैं।”

04. यह पवित्र है।

नीति वचन 15ः16 – “घबराहट के साथ बहुत रखे हुए धन से, यहोवा के भय के साथ थोड़ा ही धन उत्तम है”

05. यह खजाना है।

नीति वचन 15ः16 – “घबराहट के साथ बहुत रखे हुए धन से, यहोवा के भय के साथ थोड़ा ही धन उत्तम है”

06. यह अनन्त काल तक बना रहता है।

भजन संहिता 19ः09 – “यहोवा का भय पवित्र है, वह अनन्तकाल तक स्थिर रहता है; यहोवा के नियम सत्य और पूरी रीति से धर्ममय हैं।”

07. यह ईश्वरीय प्रदत्त है।

इब्रानियों 12ः28 – ‘‘ इस कारण हम इस राज्य को पाकर जो हिलने का नहीं, उस अनुग्रह को हाथ से न जाने दें, जिस के द्वारा हम भक्ति, और भय सहित, परमेश्वर की ऐसी आराधना कर सकते हैं जिस से वह प्रसन्न होता है।”

04. पांच बातें जो हमें परमेश्वर से डरने के लिये प्रेरित करती हैं।

01. परमेश्वर की पवित्रता हमें उससे डरने के लिये प्रेरित करती है।

प्रकाशितवाक्य 15ः04 – “हे प्रभु, कौन तुझ से न डरेगा और तेरे नाम की महिमा न करेगा? क्योंकि केवल तू ही पवित्र है, और सारी जातियां आकर तेरे साम्हने दण्डवत् करेंगी, क्योंकि तेरे न्याय के काम प्रगट हो गए हैं॥”

02. परमेश्वर की महानता हमें उससे डरने के लिये प्रेरित करती है।

व्यवस्थाविरण 10ः17 -‘‘क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा वही ईश्वरों का परमेश्वर और प्रभुओं का प्रभु है, वह महान् पराक्रमी और भय योग्य ईश्वर है, जो किसी का पक्ष नहीं करता और न घूस लेता है।”

03. परमेश्वर की अच्छाई हमें उससे डरने के लिये प्रेरित करती है।

01 शमुएल 12ः24 – “केवल इतना हो कि तुम लोग यहोवा का भय मानो, और सच्चाई से अपने सम्पूर्ण मान के साथ उसकी उपासना करो; क्योंकि यह तो सोचो कि उसने तुम्हारे लिये कैसे बड़े बड़े काम किए हैं।”

04. परमेश्वर की क्षमा हमें उससे डरने के लिये प्रेरित करती है ।

भजन संहिता 130ः04 – ‘‘परन्तु तू क्षमा करने वाला है? जिस से तेरा भय माना जाए।”

05. परमेश्वर के आश्चर्यजनक कार्य हमें उससे डरने के लिये प्रेरित करते हैं।

यहोशू 04ः23-24 – “क्योंकि जैसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने लाल समुद्र को हमारे पार हो जाने तक हमारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा था, वैसे ही उसने यरदन का भी जल तुम्हारे पार हो जाने तक तुम्हारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा; इसलिये कि पृथ्वी के सब देशों के लोग जान लें कि यहोवा का हाथ बलवन्त है; और तुम सर्वदा अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानते रहो॥”

05. चार बातें जिनसे हमें नहीं डरना चाहिये:-

01. हमें मूर्तियों और अन्य देवी-देवताओं से भयभीत नहीं होना है।

02 राजा 17ः38 – ‘‘और जो वाचा मैं ने तुम्हारे साथ बान्धी है, उसे न भूलना और पराये देवताओं का भय न मानना।”

02. हमें मनुष्यों से नहीं डरना चाहिये।

01 शमुएल 15ः24 – “शाऊल ने शमूएल से कहा, मैं ने पाप किया है; मैं ने तो अपनी प्रजा के लोगों का भय मानकर और उनकी बात सुनकर यहोवा की आज्ञा और तेरी बातों का उल्लंघन किया है।”

03. हमें सांसारिक अपदाओं और विपत्तियों से नहीं डरना चाहिये। यह तब होगा जब आपका प्रभु यीशु पर अटूट विश्वास है।

04. हमें भविष्य से नहीं घबराना चाहिये। यदि आप वचन और विश्वास में दृढ़ होते जायेंगे तो भविष्य की चिंता आपको नहीं सतायेगी।

06. परमेश्वर का भय क्यों आवश्यक है ?

01. यह आराधना के लिये आवश्यक है।

भजन संहिता 05ः7 – “मैं तेरा भय मानकर तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत् करूंगा।”

02. यह सेवा के लिये आवश्यक है।

भजन संहिता 02ः11 ‘‘डरते हुए यहोवा की उपासना करो, और कांपते हुए मगन हो।”

03. यह पाप से हमारी रक्षा करने के लिये आवश्यक है।

निर्गमन 20ः20 – “मूसा ने लोगों से कहा, डरो मत; क्योंकि परमेश्वर इस निमित्त आया है कि तुम्हारी परीक्षा करे, और उसका भय तुम्हारे मन में बना रहे, कि तुम पाप न करो।”

04. यह अच्छे शासन के लिये आवश्यक है।

02 शमुएल 23ः03 – “इस्राएल के परमेश्वर ने कहा है, इस्राएल की चट्टान ने मुझ से बातें की है, कि मनुष्यों में प्रभुता करने वाला एक धमीं होगा, जो परमेश्वर का भय मानता हुआ प्रभुता करेगा,”

05. यह न्याय करने के लिये आवश्यक है।

02 इतिहास 19ः6-7 – “और उसने न्यायियों से कहा, सोचो कि क्या करते हो, क्योंकि तुम जो न्याय करोगे, वह मनुष्य के लिये नहीं, यहोवा के लिये करोगे; और वह न्याय करते समय तुम्हारे साथ रहेगा। अब यहोवा का भय तुम में बना रहे; चौकसी से काम करना, क्योंकि हमारे परमेश्‍वर यहोवा में कुछ भी कुटिलता नहीं है, और न वह किसी का पक्ष करता और न घूस लेता है।”

06. यह हमारे मसीही जीवनों को पवित्रता में सिद्ध करने के लिये आवश्यक है।

02 कुरिन्थियों 07ः1 – “अत: हे प्रियो, जब कि ये प्रतिज्ञाएँ हमें मिली हैं, तो आओ, हम अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करें, और परमेश्‍वर का भय रखते हुए पवित्रता को सिद्ध करें।”

07. परमेश्वर के भय के दस फल

01. इससे प्रार्थना का उत्तर मिलता है ।

भजन संहिता 145ः19 – ‘‘वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, ओर उनकी दोहाई सुन कर उनका उद्धार करता है।”

02. इससे परमेश्वर प्रसन्न होता है।

भजन संहिता 147ः11 – ‘‘यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात उन से जो उसकी करूणा की आशा लगाए रहते हैं॥”

03. यह परमेश्वर की संतान पर परमेश्वर की दया को और बढ़ाता है।

भजन संहिता 103ः13– ‘‘जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।”

04. इसके कारण परमेश्वर लोगों को स्वीकार करता है।

प्रेरितों के काम 10ः35 – “अब मुझे निश्चय हुआ, कि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता; वरन हर जाति में जो उस से डरता और धर्म के काम करता है, वह उसे भाता है।”

05. इसके कारण आशीष प्राप्त होती हैं।

भजन संहिता 112ः01 – ‘‘याह की स्तुति करो। क्या ही धन्य है वह पुरूष जो यहोवा का भय मानता है; और उसकी आज्ञाओं से अति प्रसन्न रहता है!”

06. इसके कारण परमेश्वर की करूणा प्राप्त होती है।

भजन संहिता 103ः17 – परन्तु यहोवा की करूणा उसके डरवैयों पर युग युग, और उसका धर्म उनके नाती. पोतों पर भी प्रगट होता रहता है।”

07. इसके कारण पाप से दूर होते जाते हैं।

नीति वचन 16ः06 – ‘‘अधर्म का प्रायश्चित कृपा, और सच्चाई से होता है, और यहोवा के भय मानने के द्वारा मनुष्य बुराई करने से बच जाते हैं।”

08. इससे आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

नीति वचन 14ः23 – ‘‘परिश्रम से सदा लाभ होता है, परन्तु बकवाद करने से केवल घटती होती है।”

09. यह मसीही संगति लाता है।

मलाकी 03ः16 -‘‘तब यहोवा का भय मानने वालों ने आपस में बातें की, और यहोवा ध्यान धर कर उनकी सुनता था; और जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके साम्हने एक पुस्तक लिखी जाती थी।”

10. यह लम्बी आयु लाता है।

नीति वचन 10ः27 – “यहोवा के भय मानने से आयु बढ़ती है, परन्तु दुष्टों का जीवन थोड़े ही दिनों का होता है।”

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