परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला व्यवहार | Parmeshwar Ko Prasann Karne Wala Vyovhar

Bro. Deva

यह वेबसाइट आत्मिक जीवन एवं परमेश्वर के सामर्थ में बढ़ने, आलौकिक एवं जयवन्त मसीह जीवन जीने, परमेश्वर के वचन को सरलता एवं गहराई से समझने में मदद करेगी। यदि आप परमेश्वर, प्रभु यीशु मसीह के वचन को समझने के लिये भूखे और प्यासे हैं तो मेरा विश्वास है कि यह वेबसाईट आपके लिये सहायक सिद्ध होगी।

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परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला व्यवहार और चाल-चलन कैसा हो ?

मेरे प्रियों यदि हम मसीह में हैं तो यह अति आवश्यक है कि हमारा व्यवहार या चाल-चलन परमेश्वर को पसंद आये। इसलिये हमें परमेश्वर को भाने वाला व्यवहार या चाल-चलन सीखना जरूरी है। आप परमेश्वर के योग्य चाल-चलन केवल परमेश्वर के आत्मा के द्वारा और परमेश्वर के वचन के द्वारा सीख सकते हैं। परमेश्वर ने अपने वचन में वो सारी बातें जिससे परमेश्वर प्रसन्न होते हैं हमको दिया है। आईये हम पवित्र शास्त्र से कुछ वचनों को पढ़ते है………..
(कुलुस्सियों 01- 09 से 12 )
“इसी लिये जिस दिन से यह सुना है, हम भी तुम्हारे लिये यह प्रार्थना और विनती करना नहीं छोड़ते कि तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्‍वर की इच्छा की पहिचान में परिपूर्ण हो जाओ, ताकि तुम्हारा चाल–चलन प्रभु के योग्य हो, और वह सब प्रकार से प्रसन्न हो, और तुम में हर प्रकार के भले कामों का फल लगे, और तुम परमेश्‍वर की पहिचान में बढ़ते जाओ, उसकी महिमा की शक्‍ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।”
संत पौलुस जब कुलुस्सियो की कलीसिया को पत्र लिखते हैं तब इस बात के लिये कुलुस्सियों के विश्वासियों की प्रशंसा करते हैं कि वे परमेश्वर के प्रेम, विश्वास एवं सुसमाचार के अनुसार आशा में बढ़ते जा रहे थे और यह बात पौलूस ने इपफ्रास से सुना था। पौलुस आगे उनके लिये इस प्रकार प्रार्थना करते हैं –
(कुलुस्सियों 01ः09 – “इसी लिये जिस दिन से यह सुना है, हम भी तुम्हारे लिये यह प्रार्थना और विनती करना नहीं छोड़ते कि तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहिचान में परिपूर्ण हो जाओ”।) 
परमेश्वर के वचन से हम सीखते हैं कि हम भी प्रार्थना और विनती इस बात के लिये करें कि हम परमेश्वर की इच्छा को जानने का आत्मिक ज्ञान और आत्मिक समझ से भर जाएं। परमेश्वर की इच्छा को जानने का ऐसा ज्ञान संसारिक बुद्धि से नहीं आता भले ही हम संसार में कितना ही बुद्धिमान माने जाते हों, किन्तु परमेश्वर के आत्मा के द्वारा जो हमारे भीतरी मनुष्यत्व को प्रकाशित करता है और परमेश्वर के वचन के द्वारा ही आत्मिक ज्ञान और समझ प्राप्त कर सकते हैं, जिससे कि हम परमेश्वर की इच्छा को जान सके। सारे आत्मिक ज्ञान में परिपूर्ण होने का अर्थ है कि व्यावहारिक क्या है जान लेना, परमेश्वर के वचन को व्यावहारिकता और कार्य में लागू करने का ज्ञान प्राप्त कर लेना, जो परमेश्वर की ओर से आता है। कई बार ऐसा होता है कि हमको वचन मालूम होता है पर समय पर उसे व्यावहारिक रूप नहीं दे पाते।
उदाहरण के लिये (इफिसियों 04ः26 ‘‘क्रोध तो करो, पर पाप मत करो, सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे”।)
परमेश्वर का ये बहुत ही सुन्दर वचन है जो हमारे व्यवहार में ऐसा मिला होना चाहिये जैसे पानी मे दूध मिला होता है, पर कई बार पुराने विश्वासी भी इस वचन का पालन नहीं कर पाते, क्योंकि आत्मिक परिश्रम करके आत्मिक ज्ञान को प्राप्त नहीं करते हैं, आत्मिक व्यवहार की परिपक्वता को प्राप्त नहीं करते हैं। मेरे प्रियों आत्मिक उदासीनता पाप है, आत्मिक उन्माद में भरे रहें।
आत्मिक समझ का अर्थ है जब हम अपने जीवन के विभिन्न समस्याओं या विपरित और सामान्य परिस्थितियों में होते हैं तो सही निर्णय लेते हैं, परमेश्वर के वचन के अनुसार अर्थात परमेश्वर की इच्छा के अनुसार निर्णय लेते हैं। अब आप सही निर्णय कब लेंगे ? जब आपने अपने विवेक को परमेश्वर के वचन के अनुसार बना लिया है। आत्मिक समझ और आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी केवल परमेश्वर का वचन एवं परमेश्वर का आत्मा है। विश्वास के साथ आत्मिक परिश्रम करें, परमेश्वर हमें अपने ज्ञान और समझ से भर देगा। आगे हम इससे संबंधित नीतिवचन में पढ़ते हैं-
(नीतिवचन 01ः7,09ः10 – ‘‘यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है।’’ ‘‘यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है”।)
            मेरे प्रियों यदि हमें परमेश्वर की इच्छा को जानने लिये आत्मिक ज्ञान, बुद्धि और समझ चाहिये तो हमारे जीवन में परमेश्वर का भय अति आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर का भय नहीं मानता वह आत्मिक समझ और ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर से बुद्धि मांगे वह बिना कुछ कहे सरलता और उदारता से बुद्धि देता है। आगे पढ़ते हैं:-
(कुलुस्सियों 01ः10 – “ताकि तुम्हारा चाल-चलन प्रभु के योग्य हो, और वह सब प्रकार से प्रसन्न हो, और तुम में हर प्रकार के भले कामों का फल लगे, और तुम परमेश्वर की पहंचान में बढ़ते जाओ”।)
अब हम विषय के मुख्य आयत को समझेंगे जो परमेश्वर का वचन कहता है, ताकि तुम्हारा चाल-चलन या व्यवहार परमेश्वर के योग्य हो। इससे पहले हमने देखा कि हम परमेश्वर की इच्छा को जानने का आत्मिक ज्ञान प्राप्त करें, ताकि उसके इच्छा के अनुसार व्यवहार प्रदर्शित करें। अर्थात प्रभु के योग्य चाल-चलन और व्यवहार सीखने के लिये हमें सारे आत्मिक ज्ञान और समझ को प्राप्त करना आवश्यक है। यदि विश्वासी में आत्मिक समझ है तो वह अपने व्यवहार में दीनता और नम्रता सहित, धीरज धरकर प्रेम से एक-दूसरे की सह लेगा। आत्मिक ज्ञान है तो परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से लागू करेगा और अपने जीवन भर परखेगा की प्रभु को क्या भाता है। पौलुस के जीवन का उद्देश्य ही प्रभु को प्रसन्न करना था क्योंकि पौलुस आत्मिक ज्ञान और समझ से परिपूर्ण था। चाल-चलन के विषय पौलुस थिस्सलुनीकियों के कलीसिया को समझाते हैं जो-
(01 थिस्सलुनीकियों 04ः1 – “इसलिये हे भाइयो, हम तुम से विनती करते हैं और तुम्हें प्रभु यीशु में समझाते हैं कि जैसे तुम ने हम से योग्य चाल चलना और परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है, और जैसा तुम चलते भी हो, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ”।)
मेरे प्रियो हमें अपने जीवन के हर पहलू में परमेश्वर की इच्छा को जानकर उसे प्रसन्न करने वाला जीवन सीखना तो पड़ेगा। हमें अपने जीवन के व्यवहार और चाल-चलन को ध्यान से देखना पड़ेगा कि हमारा व्यवहार परमेश्वर के वचन के अनुसार है या नहीं। हर एक विश्वासी को निर्बद्धियों के समान नहीं पर बुद्धिमानो के समान चलना है। हम परमेश्वर की संतान हैं हमे ध्यान से समझना है कि प्रभु की क्या इच्छा है। कोई भी विश्वासी यदि वह परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन यापन कर रहा है तो उसके जीवन से नीचे दिये गये चार प्रमुख बातें प्रदर्शित होंगी।
  • पहली बात – हर प्रकार के भले कामों का फल लगेगा। उसके जीवन में पवित्र आत्मा का फल दिखेगा। विश्वास में हर समय बढ़ते रहेगा। प्रभु यीशु ने कहा अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं ला सकता, और न निकम्मा पेड़ अच्छा फल ला सकता है। जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है। इस प्रकार उनके फलो से तुम उन्हे पहंचान लोगे। अर्थात हमारे व्यवहार और चाल-चलन से लोग जानने पाये कि हम जीवित परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं।
  • दूसरी बात – यदि हम परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन जीते हैं तो हम सर्वदा परमेश्वर के ज्ञान और पहंचान में बढ़ते जायेंगे। परमेश्वर के वचन को गहराई से समझने लगेगे।
  • तीसरी बात – आत्मिक सामर्थ्य में बढ़ते जायेंगे। परमेश्वर की इच्छा को जानने और उसे प्रसन्न करने के परिणाम स्वरूप आत्मिक सामर्थ्य प्राप्त होती है। ऐसी सामर्थ्य जो विशाल सहनशक्ति और धीरज उत्पन्न करता है। यह सहनशक्ति हम उदाहरण स्वरूप अय्यूब के जीवन में देख सकते हैं। सहनशक्ति का अर्थ दुखभोग के नीचे आसानी से पराजित हो जाना नहीं है और धीरज का अर्थ आत्म संयम जो शीघ्र पलटकर वार नहीं करता। सहनशक्ति की घटी, निराशा और उम्मीद छोड़ देने को उत्पन्न करता है जबकि धीरता की घटी अकसर क्रोध और पलटा लेने को बढ़ाती है।
  • चौथी बात – सर्वदा परमेश्वर के प्रति धन्यवादित रहेंगे। परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला हर समय धन्यवादित हृदय रहता है। नये नियम में बहुत बार इस विषय में सीखाया गया है जो हम नीचे पढ़ते हैं:-
(01 थिस्सलुनीकियों 05ः18 – “हर बात में धन्यवाद करो, क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है”।)
              परमेश्वर का वचन हमें सीखाता है कि विश्वासी को अपने जीवन के हर एक परिस्थितियों में परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर की यह इच्छा है।
(फिलिप्पियो 04ः06 -” किसी भी बात की चिंता मत करो, परंतु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किये जाएं”।)
(कुलुस्सियो 03ः15 – “मसीह की शांति जिसके लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गये हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो”।)
(कुलुस्सियो 03ः17 – “वचन में या काम में जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो”।)
आमीन।

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